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देवभूमि में, देवों का ये कैसा रूप था ?

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देवभूमि में, देवों का ये कैसा रूप था ?
वेदना ही वेदना, चारो तरफ बिखरा हुआ विद्रूप था ।
चीख क्रंदन भी वही सब कर सके ।
सैलाब की उस क्रूरता से जो बच सके ।
पोथियों के प्रलय वर्णन सा वहाँ सब हो रहा था,
बादलों की गर्जना और पत्थरों के रोर में,
जो जहां था होश अपने खो रहा था ।
चीख भी तो हर कोई पाया नहीं ।
श्वास घुट कर रह गई होश फिर आया नहीं ।
संहार का वीभत्स वह तांडव चला,
जीवित बचें इसका नहीं मौका मिला,
मृत्यु की वीभत्सता को कुछ पलों तक झेल कर,
लाशों सने कीचड़ में दब कर रह गया ।
डूबता कोई, कोई बचाता था किसी को,
दुधमुहें को अपनी तरफ यूं खींच कर,
माँ वो मानों मृत्यु से ही लड़ रही हो ।
धर्मभीरु थे सभी, जानते थे प्रलय आएगी कभी,
स्वप्न में भी बात यह सोंची नहीं,
वह समय आ जायेगा यूं ही अभी ।
त्रासदी वीभत्स होती है जब कभी,
नियति की फिर बात होती है तभी,
नियति सुखमय रूप तब दिखलायेगा,
प्रकृति से खिलवाड़ जब रुक जायेगा ।
(उदय शंकर श्रीवास्तव)
कटरा बाजार, गोंडा
उ. प्र. 271503
मो:08126832288



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
June 15, 2014

नियति सुखमय रूप तब दिखलायेगा, प्रकृति से खिलवाड़ जब रुक जायेगा sateek likha hai aapne .aabhar

    Udai Shankar Srivastava के द्वारा
    June 16, 2014

    आप के प्रोत्स्साहन कुछ और लिखने की प्रेरणा मिलेगी . धन्यवाद .

June 15, 2014

नियति सुखमय रूप तब दिखलायेगा, प्रकृति से खिलवाड़ जब रुक जायेगा । ekdam sahi kaha uday shankar shrivastav ji .nice expression .

    Udai Shankar Srivastava के द्वारा
    June 15, 2014

    धन्यवाद, मेरी रचनाओं पर आपका आशीर्वाद मुझे हमेशा मिलता है इसके लिए आपका बहुत बहुत आभार . मैं प्रतिक्रियाएं देने में चूक कर जाता हूँ इसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ. आपके सार्थक लेखन के लिए साधुवाद .


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